Monday, December 22, 2008

अब और सहा नही जाता

इस बार नहीं 
इस बार जब वोह छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी खरोंच ले कर आएगी मैं उसे फू फू कर नहीं बहलाऊँगा पनपने दूँगा उसकी टीस को 
इस बार नहीं  
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले दर्द को रिसने दूँगा,उतारने दूँगा अन्दर गहरे 
इस बार नहीं 
इस बार मैं ना मरहम लगाऊँगा  
ना ही उठाऊँगा रुई के फाहे और ना ही कहूँगा की तुम आँखें बंद करलो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगता हूं देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव

इस बार नहीं 
इस बार जब उलझने देखूँगा,छात्पताहत देखूंगा नहीं दौडूंगा
उलझी दूर लपेटने उलझने दूँगा जब तक उलझ सके 
इस बार नहीं 

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औजार नहीं करूंगा
फिर से एक नयी शुरुआत नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की नहीं आने दूँगा 
ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर उतारने दूँगा उसे कीचड में,
टेढे मेधे रास्तों पे नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून हल्का नहीं पड़ने दूँगा 
उसका रंग इस बार नहीं बनने दूँगा 
उसे इतना लाचार की पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
 
इस बार नहीं  
इस बार घावों को देखना है गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक कुछ फैसले  
और उसके बाद हौसले कहीं तोह शुरुआत करनी ही होगी इस बार यही तय किया हैं

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