Saturday, September 15, 2012

आगे क्या होगा

गुड़गांव के बादशाह खान अस्पताल में एक बच्चा है। इसके हाथों में चोट लगी हुई है। उसके पिता ने उसे कूड़े में फेंका और चले गए। ये सोचे बिना कि इस बच्चे का आगे क्या होगा। उसी के दर्द पर ये एक छोटी सी कविता है

मुझसे वो मेरा नसीब ले गया
खामोश ज़िंदगी अजीब दे गया
कहते हैं वक़्त बदलता है
इंसान बदलता है
तू जो बदला
सब कुछ बदल गया
हालात बदल गए
विचार बदल गए
तकदीर बदल गई
हाथों की लकीर बदल गई
नहीं बदली
उस ज़ख़्म की ताज़गी
तेरी याद सालती है
हर पल आज भी
वो जो दर्द है
ज़ब्त है दिल में
संभालकर रखा है
तेरे इंतज़ार में
पर वो भरोसा अब टूटने लगा है
सब्र का वो भरम छूटने लगा है
तू लौटेगा की नहीं
तू लौटेगा की नहीं

तूफ़ान...


मेरे घर की खिड़की से आजकल ठंडी हवा आती है
लगता है शहर में कोई तूफ़ान आनेवाला है
एक नई तारीख़ से पुरानी आवाज़ उठनेवाली है
लगता है तख़्तों-ताज की शामत आई है
राम की धरती से इंकलाब की धूल उड़ी है
मुल्क़ की गलियां भी अब कुरुक्षेत्र लगती हैं
समंदर की लहरों में भी आफ़त की आहट है
अब ये जनता कामयाबी की राह पर निकली है
मेरे घर की खिड़की से आजकल ठंडी हवा आती है
लगता है शहर में कोई तूफ़ान आनेवाला है

शराब


मैं शराब नहीं पीता । ऐसे  में यार दोस्तों की महफिल में मेरे होने या ना होने से ज्यादा फर्क नहीं पडता । मिल बैठने की बात हो तो सब एक राग अलापते हैं – यार तू तो पीता भी नहीं है । क्या करेंगे मिल बैठकर ? 
कुछ समय से मैंने कोला पीना भी बंद कर दिया है । वरना पहले वो शराब लेते तो मैं कोला के ग्लास को लेकर चीयर्स कहता ।  हमेशा इस कोशिश में  भी जुटा रहता हुँ की कुछ दोस्त जैसे-तैसे मेरे गुट में शामिल हो जाए । पर अब तक सब नाकाम । साथ ही कवियों और शायरों ने शराब को जिस तरह से“romanticise” किया है वहाँ मेरी क्या चलेगी । पर अजीब बात ये है कि हर शराबी के तर्क लगभग एक से हैं । मेरी कुछ नाकामयाब कोशिशें॰॰॰॰॰॰॰
पहला पेग़….
मैं : इतनी ज़ल्दी मरने का इरादा क्यों है ? क्या करोगे इतनी शराब पी कर ?
वो : तुम क्या करोगे इतनी लम्बी ज़िन्दगी जी कर ?
दूसरा पेग़…..
मैं : ये escapist attitude है । तुम ज़िन्दगी से भाग रहे हो ।
वो : तुम भी तो ज़िन्दगी मे भाग ही रहे हो । कहीं पहुँच भी रहे हो ?
तीसरा पेग़…..
मैं : खुशी में दारु, ग़म में दारु।   कुछ काम बन जाए तो दारु , काम न बने तो दारु , बहुत ज़्यादा काम हो तो दारु , कुछ काम न हो तो भी दारु । तुम्हें बस पीने का एक बहाना चाहिए ।
वो : तुम भी तो जीने का बस एक बहाना ही ढुंढ रहे हो । मिल जाए तो बता देना ।
मैं : यूं घुट-घुटकर मरने का क्या फायदा ?
वो : यूं घुट-घुटकर जीने का क्या है फलसफा ?
चौथा पेग़……
मैं : अपनी नहीं तो घरवालों की सोचो । उन्हें पता चलेगा तो कितना दुखी होंगे ।
वो : दुखी तो मैं भी हुँ । कम से कम ये तो नहीं पता है उन्हें । वरना और दुखी होगें ।
 नई बोतल……
मैं : अब बस भी करो । आज बहुत पी चुके तुम ।
वो : तुम girlfriend  मत बनो । यार तुम दोस्त हो दोस्त ही रहो ।
आपके पास कोइ और तर्क है क्या ?

स्थायी पता


कुछ नई दीवारें
एक नई छत
कुछ नई खिड़कीयाँ
उस साइज के नए परदे ।
साथ मे कुछ नए कपड़े
एक जोडी़ नई चप्पल
कुछ नए
कुछ पुराने यार-दोस्त ।
ज़िन्दगी की मियाद यहां बस ग्यारह महीने की
फिर एक नया पता
इस शहर में जब से आया हुँ
“स्थायी पता”  के आगे जगह खाली छोड़ देता

Monday, December 22, 2008

अब और सहा नही जाता

इस बार नहीं 
इस बार जब वोह छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी खरोंच ले कर आएगी मैं उसे फू फू कर नहीं बहलाऊँगा पनपने दूँगा उसकी टीस को 
इस बार नहीं  
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले दर्द को रिसने दूँगा,उतारने दूँगा अन्दर गहरे 
इस बार नहीं 
इस बार मैं ना मरहम लगाऊँगा  
ना ही उठाऊँगा रुई के फाहे और ना ही कहूँगा की तुम आँखें बंद करलो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगता हूं देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव

इस बार नहीं 
इस बार जब उलझने देखूँगा,छात्पताहत देखूंगा नहीं दौडूंगा
उलझी दूर लपेटने उलझने दूँगा जब तक उलझ सके 
इस बार नहीं 

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औजार नहीं करूंगा
फिर से एक नयी शुरुआत नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की नहीं आने दूँगा 
ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर उतारने दूँगा उसे कीचड में,
टेढे मेधे रास्तों पे नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून हल्का नहीं पड़ने दूँगा 
उसका रंग इस बार नहीं बनने दूँगा 
उसे इतना लाचार की पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
 
इस बार नहीं  
इस बार घावों को देखना है गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक कुछ फैसले  
और उसके बाद हौसले कहीं तोह शुरुआत करनी ही होगी इस बार यही तय किया हैं